Wednesday, April 13, 2016

हमारी गली का नया बाग़


गली का नया बाग        

यही है
हमारी गली का
नया बाग.
यहां घास उगेगी
उधर होंगी क्यारियां
खुशनुमा फूलों के इंद्रधनुष.

इससे पहले
थे कुछ लोग यहां
कहाँ गए
और
जाएंगे कहां नहीं-उखाड़े जाएंगे जब

यहीं नाली के पास
धन्नू बांसुरी वाले
गन्ने बेचते थे
बांसुरी रसभरी.
कुछ हट बैठती
मां फत्ते की.
कहते हैं
कहीं हीरो बन गया जाकर!

यहां मां
आधे शीशों का
बेकमानीदार चश्मा लगाए
बेचती रहीं
कटे फल
कटारे
गोलियां-गुब्बारे
आती थीं मक्खियां सिर्फ।

पड़ोसी थे
मेहरअली पहलवान
जांबाज जवान
टूटी हड्डियां जोड़ते
पिंजर होकर मरे
लड़ाई आखिरी
न जाने
किससे भिडे थे

बरसाती नाली में
नावें
पिंटू, मोती, गोरू
बालू और लेनू की
उधर किले,
महल-मंदिर-मकान
शहर बन-बन टूटते
छुअम छुआई
कोड़ा जमालशाही
छूमंतर के खेल.

कहानियाँ परियों की
सुनाती चाची सुमित्रा
बंगाले वाली
सिंदूरी चावल
कौओं को चुगाती
लोग कहते डायन-प्रेतनी.
 
बीचोंबीच था
जहरी बाबा का नीम
बेहद बड़वा बोलते
निम्बोलियां टूंगती
उठती छोरियां
कहां गई-पता नहीं.

पूस की रात में गप्पू की भैंस भी
आ समाती झोंपड़ी में
दीवार पर
उपलों की अल्पना
नई नई

छाजन पर
सूरज सेंकती
कथरियां-गुदडि़यां
गीत बरसात के
छेद भरे टीन पर
टप टप बज बहते रहे.

उसके पीछे, नीचे और ऊपर
इधर बाहर कोने में
और अंदर
यहीं फंस- धंसकर
बेधड़क-धड़धड़
कितना संसार बेहिसाब जिंदा था.

तभी कहा किसी ने
जादू दिखाओ
किसी ने मारा मंतर
उड़ गए, कहां गए
रात ही रात में!.

अब यहां घास उगेगी
उधर फूल खिलेंगे
जी, हां,
यही है
हमारी गली का नया बाग।

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