गली का नया बाग
यही
है
हमारी
गली कानया बाग.
यहां घास उगेगी
उधर होंगी क्यारियां
खुशनुमा फूलों के इंद्रधनुष.
इससे
पहले
थे
कुछ लोग यहांकहाँ गए
और
जाएंगे कहां नहीं-उखाड़े जाएंगे जब
यहीं
नाली के पास
धन्नू
बांसुरी वालेगन्ने बेचते थे
बांसुरी रसभरी.
कुछ हट बैठती
मां फत्ते की.
कहते हैं
कहीं हीरो बन गया जाकर!
यहां
मां
आधे
शीशों काबेकमानीदार चश्मा लगाए
बेचती रहीं
कटे फल
कटारे
गोलियां-गुब्बारे
आती थीं मक्खियां सिर्फ।
पड़ोसी
थे
मेहरअली
पहलवानजांबाज जवान
टूटी हड्डियां जोड़ते
पिंजर होकर मरे
लड़ाई आखिरी
न जाने
किससे भिडे थे
बरसाती
नाली में
नावेंपिंटू, मोती, गोरू
बालू और लेनू की
उधर किले,
महल-मंदिर-मकान
शहर बन-बन टूटते
छुअम छुआई
कोड़ा जमालशाही
छूमंतर के खेल.
कहानियाँ
परियों की
सुनाती
चाची सुमित्राबंगाले वाली
सिंदूरी चावल
कौओं को चुगाती
लोग कहते डायन-प्रेतनी.
बीचोंबीच था
जहरी बाबा का नीम
बेहद बड़वा बोलते
निम्बोलियां टूंगती
उठती छोरियां
कहां गई-पता नहीं.
पूस
की रात में गप्पू की भैंस भी
आ
समाती झोंपड़ी मेंदीवार पर
उपलों की अल्पना
नई नई
छाजन
पर
सूरज
सेंकतीकथरियां-गुदडि़यां
गीत बरसात के
छेद भरे टीन पर
टप टप बज बहते रहे.
उसके
पीछे, नीचे और ऊपर
इधर
बाहर कोने मेंऔर अंदर
यहीं फंस- धंसकर
बेधड़क-धड़धड़
कितना संसार बेहिसाब जिंदा था.
तभी
कहा किसी ने
जादू
दिखाओकिसी ने मारा मंतर
उड़ गए, कहां गए
रात ही रात में!.
अब
यहां घास उगेगी
उधर
फूल खिलेंगेजी, हां,
यही है
हमारी गली का नया बाग।
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