Friday, April 27, 2018

पुस्तकें बदल गईं --देवेन्द्र कुमार-- कविता


पुस्तकें बदल गईं—देवेन्द्र कुमार—कविता
                                         

मैं

कहीं और था

यहाँ पुस्तकें बदल गईं
 

बाहर ही रोककर

पूछा गया

यह नहीं

कि क्या था मेरे पास

बताऊं

मैं हूं किसके साथ?

क्या कहता

हिला दिए

खाली हाथ
 

मैं था जंगल में

डरी हुई चिडि़या से बातों में

और

यहां वे लगे थे

धरती-आकाश मिलाने में

सच

बहुत कुछ बन गया था

पूरी बस्ती

खर्च हो गई थी

महज

एक दीवार उठाने में
 
मैं उडा था

हवा में

टूटे पत्ते सा

फूलों पर टलमल

मोतियों में

इंद्रधनुष देखता

वहां

हंसी का अर्थ

खिलना

यहां

खिलखिल अमरबेल

चढ़ी है

गैर आंसुओं की मुंडेरी

 सचमुच

पुस्तकें बदल गईं।

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Monday, April 23, 2018

तुम और मैं--देवेन्द्र कुमार--कविता


तुम और मैं—देवेन्द्र कुमार—कविता  

तुमने शब्द चुने

मैं पराया हो गया।

एक एक शब्द में

हजार अर्थ

हर अर्थ में

मैं और मेरा सब

न जाने

कितनी कितनी बार व्यर्थ।

 

ये अर्थ हैं?

तो वह क्या था?

हर कहीं

हर समय

हम निःशब्द निकट,

बांसों की बांसुरी

चहक पंखों की

झीलों के दरपन

पोंछती धूप

कभी घुलते

चांद-तारे

ये सब

कैसे कैसे

पुल बनाएं

हम और तुम

दौड़ चले जाएं!
 
-लेकिन

तुम्हारा सार्थक होने का मोह!

क्या कहूं?

तुमने अर्थ चुने

मैं पराया हो गया!

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पुस्तकें बदल गईं --देवेन्द्र कुमार --कविता


पुस्तकें बदल गईं—देवेन्द्र कुमार—कविता
                                         

मैं

कहीं और था

यहाँ पुस्तकें बदल गईं
 

बाहर ही रोककर

पूछा गया

यह नहीं

कि क्या था मेरे पास

बताऊं

मैं हूं किसके साथ?

क्या कहता

हिला दिए

खाली हाथ
 

मैं था जंगल में

डरी हुई चिडि़या से बातों में

और

यहां वे लगे थे

धरती-आकाश मिलाने में

सच

बहुत कुछ बन गया था

पूरी बस्ती

खर्च हो गई थी

महज

एक दीवार उठाने में
 

मैं उडा था

हवा में

टूटे पत्ते सा

फूलों पर टलमल

मोतियों में

इंद्रधनुष देखता

वहां

हंसी का अर्थ

खिलना

यहां

खिलखिल अमरबेल

चढ़ी है

गैर आंसुओं की मुंडेरी
 

सचमुच

पुस्तकें बदल गईं।

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