पत्नी सोते-सोते मुसकराई
पत्नी
सोते-सोतेमुसकराई
मां कसम
मेरी तो
जान पर बन आई
-इस वक्त
आधी रात को
कौन है इसके भीतर?
सुबह दिखाएगी
तेवर
सारा घर बेघर
वही झनक पटक
काम की बकबक
प्यालियों में भरा
जलतरंगी सुखकब का
गंदी नालियो में
बह गया
घिसकर सब
हो गया
गोल-बेमोल
इसकी यह हिम्मत!
मैंने उसेझिंझोड़ दिया।
कांपकर जाग गई।
आंखें थीं एकदम
खाली।
कितनी मक्कार!
बेहद खबरदार!आंसुओं के
बहाने
सब कुछ धो धुला दिया।
और अब
उसके आंसू
किरचों की तरह
मुझमें गड़ रहे थे
बोलों के गोल पत्थर
बड़ी बेरहमी से
पड़ रहे थे
क्या करता
बहाना बनाकरबहलाया
न जाने कब से उलझे
बालों को
बेमन सहलाया
लेकिन किसी भी तरह
फिर
नींद से होकर
मुसकान तक
नहीं ले जा पाया।
हां, सोते-सोते जागी
मुसकान कोपोंछकर
आंसुओं तक पहुंचाना
अवश्य आ गया है,
मेरी छोडि़ये,
पूरी दुनिया को
यही खेल
भा गया है!