Sunday, January 31, 2016

कविता: पत्नी सोते सोते मुस्कराई


पत्नी सोते-सोते मुसकराई

पत्नी
सोते-सोते
मुसकराई
मां कसम
मेरी तो
जान पर बन आई
-इस वक्त
आधी रात को
कौन है इसके भीतर?

सुबह दिखाएगी
तेवर
सारा घर बेघर
वही झनक पटक
काम की बकबक

प्यालियों में भरा
जलतरंगी सुख
कब का
गंदी नालियो में
बह गया
घिसकर सब
हो गया
गोल-बेमोल

इसकी यह हिम्मत!
मैंने उसे
झिंझोड़ दिया।
कांपकर जाग गई।
आंखें थीं एकदम
खाली।

कितनी मक्कार!
बेहद खबरदार!
आंसुओं के
बहाने
सब कुछ धो धुला दिया।
 
और अब
उसके आंसू
किरचों की तरह
मुझमें गड़ रहे थे
बोलों के गोल पत्थर
बड़ी बेरहमी से
पड़ रहे थे

क्या करता
बहाना बनाकर
बहलाया
न जाने कब से उलझे
बालों को
बेमन सहलाया
लेकिन किसी भी तरह
फिर
नींद से होकर
मुसकान तक
नहीं ले जा पाया।

हां, सोते-सोते जागी
मुसकान को
पोंछकर
आंसुओं तक पहुंचाना
अवश्य आ गया है,
मेरी छोडि़ये,
पूरी दुनिया को
यही खेल
भा गया है!

Saturday, January 30, 2016

कविता : पुस्तकें बदल गईं


पुस्तकें बदल गईं

मैं
कहीं और था
यहां
पुस्तकें बदल गईं
बाहर ही रोककर
पूछा गया
यह नहीं
कि क्या था मेरे पास
बताऊं
मैं हूं किसके साथ?
क्या कहता
हिला दिए
खाली हाथ

मैं था जंगल में
डरी हुई चिडि़या से बातों में
और
यहां वे लगे थे
धरती-आकाश मिलाने में
सच
बहुत कुछ बन गया था
पूरी बस्ती
खर्च हो गई थी
महज
एक दीवार उठाने में

मैं फिरा था
हवा में
टूटे पत्ते सा उन्मुक्त
फूलों पर टलमल
मोतियों में
इंद्रधनुष देखता

वहां
हंसी का अर्थ
खिलना
यहां
खिलखिल अमरबेल
चढ़ी है
गैर आंसुओं की मुंडेरी
 
सचमुच
पुस्तकें बदल गईं।