Saturday, January 30, 2016

कविता : पुस्तकें बदल गईं


पुस्तकें बदल गईं

मैं
कहीं और था
यहां
पुस्तकें बदल गईं
बाहर ही रोककर
पूछा गया
यह नहीं
कि क्या था मेरे पास
बताऊं
मैं हूं किसके साथ?
क्या कहता
हिला दिए
खाली हाथ

मैं था जंगल में
डरी हुई चिडि़या से बातों में
और
यहां वे लगे थे
धरती-आकाश मिलाने में
सच
बहुत कुछ बन गया था
पूरी बस्ती
खर्च हो गई थी
महज
एक दीवार उठाने में

मैं फिरा था
हवा में
टूटे पत्ते सा उन्मुक्त
फूलों पर टलमल
मोतियों में
इंद्रधनुष देखता

वहां
हंसी का अर्थ
खिलना
यहां
खिलखिल अमरबेल
चढ़ी है
गैर आंसुओं की मुंडेरी
 
सचमुच
पुस्तकें बदल गईं।

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