Sunday, October 4, 2020

पुराना दोस्त-कहानी-देवेंद्र कुमाR

 

      पुराना दोस्त-कहानी-देवेंद्र कुमाR

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   दीवाली पर घर की सफाई चल रही थी। निशीथ काम में मम्मी-पापा का हाथ बँटा रहा था। स्कूल की छुट्टी थी। बाबा भी अपनी पुरानी चीजें देखभाल रहे थे। घर की काफी पुरानी चीजें बाहर निकाली जा चुकी थीं। जब भी कोई पुरानी चीज बाहर निकाली जाती तो बाबा कह देते, उसे मत छुओ, अभी रखी रहने दो! फिर बताने लगते कौन-सी चीज कितनी पुरानी थी और बातों-बातों में बाबा सबको अपने बचपन में ले जाते। अक्सर ही वह सबको अपने बाबा-दादी की बातें बताकर हँसाया करते थे। पर निशीथ ने कई देखा था कि हँसते हुए बाबा की आँखों से आँसू टपक पड़ते थे।

इसी बीच निशीथ बाबा के कमरे में रखा पुराना छाता बाहर निकाल लाया। छाता बहुत मुश्किल से खोला जा सका। उसकी हालत देखकर निशीथ, उसकी मम्मी और पापा खूब हँसे। बाबा भी हँसने लगे, क्योंकि बात ही हँसने की थी। छाते पर लगे काले कपड़े में जगह-जगह छेद थे। बाबा ने कहा, “तुम लोगों ने ऐसा छाता इससे पहले कभी नहीं देखा होगा।

सबने कहा, “हाँ।

जिसमें जगह-जगह गोल-गोल खिड़कियाँ हों धूप और हवा आने के लिए।बाबा बोले और खूब जोर से हँस पड़े।

निशीथ ने कहा, “बाबा, इस गोल खिड़कियों वाले छाते को अब घर से गोल करना पड़ेगा।और वह बाबा के पुराने छाते को बाहर फेंकने के लिए चल दिया।

बाबा चिल्ला उठे, “अरे क्या हर पुरानी चीज को फेंक देगा। नहीं, नहीं, ठहर जा, छाते को मत फेंक। मेरे दिमाग में एक बात है। पर पहले छाता इधर ला।

                                 1

पुराने छाते के लिए बाबा की बेचैनी देखकर निशीथ के पापा जोर से हँसे। उन्होंने कहा, “पिताजी, आप      तो छाते के लिए इस तरह बेचैन हो रहे हैं जैसे वह आपका कोई पुराना दोस्त हो।

तुमने एकदम ठीक कहा, यह छाता मुझे बहुत प्रिय है। किसी ने मुझे उपहार में दिया था। बहुत पुरानी बात है। तब मैं निशीथ से थोड़ा ही बड़ा था। मैं कहीं से घर आ रहा था तो बारिश होने लगी। धीरे-धीरे बारिश बहुत तेज हो गई। एक जगह ठहरकर बारिश रुकने का इंतजार करने लगा, पर बारिश तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उल्टे उसकी तेजी ज्यादा ही बढ़ती जा रही थी। सड़क पर भी पानी भर गया था। मैं सोच रहा था घर पर माँ चिंता कर रही होंगी। उन्हें कैसे खबर दूँ। तब आजकल की तरह हरेक के हाथ में मोबाइल तो होते नहीं थे। तभी एक आदमी मेरे पास आया। उसने मुझसे कहा, ‘बच्चे, यह बारिश जल्दी नहीं रुकेगी और तुम पहले ही काफी भीग चुके हो।यह कहते हुए उसने एक छाता मेरे हाथ में थमा दिया। बोला, ‘जाओ, अब आराम से घर चले जाओ।

लेकिन मैं कुछ कह न सका क्योंकि मेरे हाथ में छाता थमाकर वह आदमी बारिश में कहाँ चला गया कुछ पता न चला। मैं काफी देर तक वहाँ खड़ा इधर-उधर देखता रहा कि वह अजनबी मिल जाए तो उसका छाता उसे वापस कर दूँ। पर वह मुझे कहीं नजर नहीं आया। और उस दिन क्या, बाद में भी वह आदमी मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। तब से मैं  इस छाते को सदा अपने पास रखता हूँ। यह मुझे एक ऐसे आदमी की याद दिलाता है जो न जाने क्यों मुझे अपना छाता देकर खुद भीगता हुआ चला गया था।

निशीथ और उसके मम्मी-पापा समझ गए कि छाता चाहे एकदम ही टूट क्यों न जाए, बाबा इसे कभी अपने से दूर नहीं करेंगे।

निशीथ ने कहा, “बाबा, आप इस छाते को सँभालकर रखिए, पर प्लीज इसे बारिश में लेकर मत निकलिए, पता नहीं देखने वाले क्या सोचेंगे।तभी निशीथ के पापा ने एक नया छाता उन्हें थमा दिया। बोले, “बारिश या धूप में आप नया छाता लेकर जाया करें।

निशीथ के बाबा देर तक नए छाते को देखते रहे। कुछ बोले नहीं।

उस दिन बाबा धूप में निकले तो निशीथ ने कहा, “बाबा, आप आज नया छाता लेकर जाइए।

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बाबा ने नए छाते के साथ पुराना छाता भी हाथ में उठा लिया।

बाबा, दो छाते किसलिए?” निशीथ ने पूछा।

ताकि बारिश और धूप दोनों से बचाव हो सके।बाबा हँसकर बोले और बाहर चले गए। उन्होंने धूप से बचने के लिए नया छाता लगा लिया, पुराना छाता दूसरे हाथ में था। चलते-चलते सोच रहे थे, ‘नया छाता सिर पर है तो पुराना किसलिए? समय बदलता हे तो पुराने की जगह नया आ जाता है- लेकिन क्या पुराने को छोड़ना इतना आसान होता है?’

वह सड़क पर चले जा रहे थे तो बच्चे की आवाज कानों में पड़ी। रुककर इधर-उधर देखने लगे। सोच रहे थे, ‘इतनी कड़ी धूप में बच्चा कहाँ से आया।आवाज एकदम पास सुनाई दी थी। बाबा ने देखा एक औरत फुटपाथ पर बैठी कपड़े प्रेस कर रही थी। उसका मुँह पसीने से भीगा हुआ था, पास ही एक झाड़ी की ओट में जमीन पर बिछपे कपड़े पर एक नन्हा-मुन्ना लेटा हाथ-पैर चला रहा था। औरत प्रेस करते-करते झाड़ी की ओट में लेटे बच्चे को बार-बार देख लेती थी। झाड़ी की पत्तियों से छनकर धूप की बिंदियाँ नन्हे बच्चे के बदन पर गिर रही थीं, वह गरमी से बेचैन था। बाबा कुछ पल खड़े-खड़े देखते रहे फिर अपना पुराना छाता खोलकर बच्चे के ऊपर लगा दिया। छाते के फटे हिस्सों से धूप बच्चे पर गिर तो रही थी पर पहले से बहुत कम।

बाबा छाता लगाकर सीधे खड़े हो गए। उन्होंने प्रेस करती हुई औरत की ओर देखा। वह हौले-से मुस्कराई जैसे उन्हें धन्यवाद दे रही हो। बाबा थोड़ा आगे बढ़ गए। मन में एक बहुत पुरानी तस्वीर कौंध गई। तेज बारिश में एक आदमी उन्हें छाता देकर न जाने कहाँ चला गया था। उनकी नजर फिर छाते के नीचे लेटे, हाथ-पैर चलाते बच्चे पर टिक गई। धूप के टुकड़े छाते के छेदों से होकर बच्चे पर गिर रहे थे।

बाबा फिर से बच्चे के पास जा पहुँचे। पुराना छाता हटाकर उसकी जगह नया छाता लगा दिया। अब बच्चे का पूरा शरीर छतरी की छाया में आया गया था। धूप बिलकुल नहीं पड़ रही थी उसके ऊपर। उन्होंने हौले-से बच्चे के गाल थपथपाए और आगे बढ़ चले। उन्होंने पुराना छाता खोल कर कर लगा लिया था। पीछे से प्रेस करने वाली औरत पुकार रही थी, “बाबूजी, बाबूजी आपका छाता... बाबूजी...लेकिन बाबा रुके नहीं, बढ़ते चले गए।

सबसे पहले निशीथ ने बाबा को देखा जो पुराना छाता लगाए चले आ रहे थे। वह बोला, “बाबा, नए छाते का क्या हुआ जो यह पुराना छाता लगा रखा है?”

उस दिन झूठ बोलने में बाबा को जरा भी दिक्कत नहीं हुई। बोले, “अरे भाई, एक जगह पानी पीने के लिए रुका था। वहीं छाता एक तरफ टिका दिया था। बस फिर उठाना भूल गया। यह ध्यान देर में आया कि मैंने पुराना छाता सिर पर लगा रखा है। मैं लौटकर उस जगह गया भी, पर भला नए छाते को कौन छोड़ता है।

झूठ बोलते हुए बाबा मुस्करा रहे थे। आँखों में नए छाते की छाया में आराम से लेटे नन्हे बच्चे की छवि उभर रही थी।(समाप्त)

 

पुराना दोस्त—कहानी—देवेन्द्र कुमार

पुराना दोस्त—कहानी—देवेन्द्र कुमार ++++++++++++++++++++ . दीवाली पर घर की सफाई चल रही थी। निशीथ काम में मम्मी-पापा का हाथ बँटा रहा था। स्कूल की छुट्टी थी। बाबा भी अपनी पुरानी चीजें देखभाल रहे थे। घर की काफी पुरानी चीजें बाहर निकाली जा चुकी थीं। जब भी कोई पुरानी चीज बाहर निकाली जाती तो बाबा कह देते, उसे मत छुओ, अभी रखी रहने दो! फिर बताने लगते कौन-सी चीज कितनी पुरानी थी और बातों-बातों में बाबा सबको अपने बचपन में ले जाते। अक्सर ही वह सबको अपने बाबा-दादी की बातें बताकर हँसाया करते थे। पर निशीथ ने कई देखा था कि हँसते हुए बाबा की आँखों से आँसू टपक पड़ते थे। इसी बीच निशीथ बाबा के कमरे में रखा पुराना छाता बाहर निकाल लाया। छाता बहुत मुश्किल से खोला जा सका। उसकी हालत देखकर निशीथ, उसकी मम्मी और पापा खूब हँसे। बाबा भी हँसने लगे, क्योंकि बात ही हँसने की थी। छाते पर लगे काले कपड़े में जगह-जगह छेद थे। बाबा ने कहा, “तुम लोगों ने ऐसा छाता इससे पहले कभी नहीं देखा होगा।” सबने कहा, “हाँ।” “जिसमें जगह-जगह गोल-गोल खिड़कियाँ हों धूप और हवा आने के लिए।” बाबा बोले और खूब जोर से हँस पड़े। निशीथ ने कहा, “बाबा, इस गोल खिड़कियों वाले छाते को अब घर से गोल करना पड़ेगा।” और वह बाबा के पुराने छाते को बाहर फेंकने के लिए चल दिया। बाबा चिल्ला उठे, “अरे क्या हर पुरानी चीज को फेंक देगा। नहीं, नहीं, ठहर जा, छाते को मत फेंक। मेरे दिमाग में एक बात है। पर पहले छाता इधर ला।” 1 पुराने छाते के लिए बाबा की बेचैनी देखकर निशीथ के पापा जोर से हँसे। उन्होंने कहा, “पिताजी, आप तो छाते के लिए इस तरह बेचैन हो रहे हैं जैसे वह आपका कोई पुराना दोस्त हो।” “तुमने एकदम ठीक कहा, यह छाता मुझे बहुत प्रिय है। किसी ने मुझे उपहार में दिया था। बहुत पुरानी बात है। तब मैं निशीथ से थोड़ा ही बड़ा था। मैं कहीं से घर आ रहा था तो बारिश होने लगी। धीरे-धीरे बारिश बहुत तेज हो गई। एक जगह ठहरकर बारिश रुकने का इंतजार करने लगा, पर बारिश तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उल्टे उसकी तेजी ज्यादा ही बढ़ती जा रही थी। सड़क पर भी पानी भर गया था। मैं सोच रहा था घर पर माँ चिंता कर रही होंगी। उन्हें कैसे खबर दूँ। तब आजकल की तरह हरेक के हाथ में मोबाइल तो होते नहीं थे। तभी एक आदमी मेरे पास आया। उसने मुझसे कहा, ‘बच्चे, यह बारिश जल्दी नहीं रुकेगी और तुम पहले ही काफी भीग चुके हो।’ यह कहते हुए उसने एक छाता मेरे हाथ में थमा दिया। बोला, ‘जाओ, अब आराम से घर चले जाओ।’ लेकिन मैं कुछ कह न सका क्योंकि मेरे हाथ में छाता थमाकर वह आदमी बारिश में कहाँ चला गया कुछ पता न चला। मैं काफी देर तक वहाँ खड़ा इधर-उधर देखता रहा कि वह अजनबी मिल जाए तो उसका छाता उसे वापस कर दूँ। पर वह मुझे कहीं नजर नहीं आया। और उस दिन क्या, बाद में भी वह आदमी मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। तब से मैं इस छाते को सदा अपने पास रखता हूँ। यह मुझे एक ऐसे आदमी की याद दिलाता है जो न जाने क्यों मुझे अपना छाता देकर खुद भीगता हुआ चला गया था।” निशीथ और उसके मम्मी-पापा समझ गए कि छाता चाहे एकदम ही टूट क्यों न जाए, बाबा इसे कभी अपने से दूर नहीं करेंगे। निशीथ ने कहा, “बाबा, आप इस छाते को सँभालकर रखिए, पर प्लीज इसे बारिश में लेकर मत निकलिए, पता नहीं देखने वाले क्या सोचेंगे।” तभी निशीथ के पापा ने एक नया छाता उन्हें थमा दिया। बोले, “बारिश या धूप में आप नया छाता लेकर जाया करें।” निशीथ के बाबा देर तक नए छाते को देखते रहे। कुछ बोले नहीं। उस दिन बाबा धूप में निकले तो निशीथ ने कहा, “बाबा, आप आज नया छाता लेकर जाइए।” 2 बाबा ने नए छाते के साथ पुराना छाता भी हाथ में उठा लिया। “बाबा, दो छाते किसलिए?” निशीथ ने पूछा। “ताकि बारिश और धूप दोनों से बचाव हो सके।” बाबा हँसकर बोले और बाहर चले गए। उन्होंने धूप से बचने के लिए नया छाता लगा लिया, पुराना छाता दूसरे हाथ में था। चलते-चलते सोच रहे थे, ‘नया छाता सिर पर है तो पुराना किसलिए? समय बदलता हे तो पुराने की जगह नया आ जाता है- लेकिन क्या पुराने को छोड़ना इतना आसान होता है?’ वह सड़क पर चले जा रहे थे तो बच्चे की आवाज कानों में पड़ी। रुककर इधर-उधर देखने लगे। सोच रहे थे, ‘इतनी कड़ी धूप में बच्चा कहाँ से आया।’ आवाज एकदम पास सुनाई दी थी। बाबा ने देखा एक औरत फुटपाथ पर बैठी कपड़े प्रेस कर रही थी। उसका मुँह पसीने से भीगा हुआ था, पास ही एक झाड़ी की ओट में जमीन पर बिछपे कपड़े पर एक नन्हा-मुन्ना लेटा हाथ-पैर चला रहा था। औरत प्रेस करते-करते झाड़ी की ओट में लेटे बच्चे को बार-बार देख लेती थी। झाड़ी की पत्तियों से छनकर धूप की बिंदियाँ नन्हे बच्चे के बदन पर गिर रही थीं, वह गरमी से बेचैन था। बाबा कुछ पल खड़े-खड़े देखते रहे फिर अपना पुराना छाता खोलकर बच्चे के ऊपर लगा दिया। छाते के फटे हिस्सों से धूप बच्चे पर गिर तो रही थी पर पहले से बहुत कम। बाबा छाता लगाकर सीधे खड़े हो गए। उन्होंने प्रेस करती हुई औरत की ओर देखा। वह हौले-से मुस्कराई जैसे उन्हें धन्यवाद दे रही हो। बाबा थोड़ा आगे बढ़ गए। मन में एक बहुत पुरानी तस्वीर कौंध गई। तेज बारिश में एक आदमी उन्हें छाता देकर न जाने कहाँ चला गया था। उनकी नजर फिर छाते के नीचे लेटे, हाथ-पैर चलाते बच्चे पर टिक गई। धूप के टुकड़े छाते के छेदों से होकर बच्चे पर गिर रहे थे। बाबा फिर से बच्चे के पास जा पहुँचे। पुराना छाता हटाकर उसकी जगह नया छाता लगा दिया। अब बच्चे का पूरा शरीर छतरी की छाया में आया गया था। धूप बिलकुल नहीं पड़ रही थी उसके ऊपर। उन्होंने हौले-से बच्चे के गाल थपथपाए और आगे बढ़ चले। उन्होंने पुराना छाता खोल कर कर लगा लिया था। पीछे से प्रेस करने वाली औरत पुकार रही थी, “बाबूजी, बाबूजी आपका छाता... बाबूजी...” लेकिन बाबा रुके नहीं, बढ़ते चले गए। सबसे पहले निशीथ ने बाबा को देखा जो पुराना छाता लगाए चले आ रहे थे। वह बोला, “बाबा, नए छाते का क्या हुआ जो यह पुराना छाता लगा रखा है?” उस दिन झूठ बोलने में बाबा को जरा भी दिक्कत नहीं हुई। बोले, “अरे भाई, एक जगह पानी पीने के लिए रुका था। वहीं छाता एक तरफ टिका दिया था। बस फिर उठाना भूल गया। यह ध्यान देर में आया कि मैंने पुराना छाता सिर पर लगा रखा है। मैं लौटकर उस जगह गया भी, पर भला नए छाते को कौन छोड़ता है।” झूठ बोलते हुए बाबा मुस्करा रहे थे। आँखों में नए छाते की छाया में आराम से लेटे नन्हे बच्चे की छवि उभर रही थी।(समाप्त)

पुराना दोस्त—कहानी—देवेन्द्र कुमार

पुराना दोस्त—कहानी—देवेन्द्र कुमार ++++++++++++++++++++ . दीवाली पर घर की सफाई चल रही थी। निशीथ काम में मम्मी-पापा का हाथ बँटा रहा था। स्कूल की छुट्टी थी। बाबा भी अपनी पुरानी चीजें देखभाल रहे थे। घर की काफी पुरानी चीजें बाहर निकाली जा चुकी थीं। जब भी कोई पुरानी चीज बाहर निकाली जाती तो बाबा कह देते, उसे मत छुओ, अभी रखी रहने दो! फिर बताने लगते कौन-सी चीज कितनी पुरानी थी और बातों-बातों में बाबा सबको अपने बचपन में ले जाते। अक्सर ही वह सबको अपने बाबा-दादी की बातें बताकर हँसाया करते थे। पर निशीथ ने कई देखा था कि हँसते हुए बाबा की आँखों से आँसू टपक पड़ते थे। इसी बीच निशीथ बाबा के कमरे में रखा पुराना छाता बाहर निकाल लाया। छाता बहुत मुश्किल से खोला जा सका। उसकी हालत देखकर निशीथ, उसकी मम्मी और पापा खूब हँसे। बाबा भी हँसने लगे, क्योंकि बात ही हँसने की थी। छाते पर लगे काले कपड़े में जगह-जगह छेद थे। बाबा ने कहा, “तुम लोगों ने ऐसा छाता इससे पहले कभी नहीं देखा होगा।” सबने कहा, “हाँ।” “जिसमें जगह-जगह गोल-गोल खिड़कियाँ हों धूप और हवा आने के लिए।” बाबा बोले और खूब जोर से हँस पड़े। निशीथ ने कहा, “बाबा, इस गोल खिड़कियों वाले छाते को अब घर से गोल करना पड़ेगा।” और वह बाबा के पुराने छाते को बाहर फेंकने के लिए चल दिया। बाबा चिल्ला उठे, “अरे क्या हर पुरानी चीज को फेंक देगा। नहीं, नहीं, ठहर जा, छाते को मत फेंक। मेरे दिमाग में एक बात है। पर पहले छाता इधर ला।” 1 पुराने छाते के लिए बाबा की बेचैनी देखकर निशीथ के पापा जोर से हँसे। उन्होंने कहा, “पिताजी, आप तो छाते के लिए इस तरह बेचैन हो रहे हैं जैसे वह आपका कोई पुराना दोस्त हो।” “तुमने एकदम ठीक कहा, यह छाता मुझे बहुत प्रिय है। किसी ने मुझे उपहार में दिया था। बहुत पुरानी बात है। तब मैं निशीथ से थोड़ा ही बड़ा था। मैं कहीं से घर आ रहा था तो बारिश होने लगी। धीरे-धीरे बारिश बहुत तेज हो गई। एक जगह ठहरकर बारिश रुकने का इंतजार करने लगा, पर बारिश तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उल्टे उसकी तेजी ज्यादा ही बढ़ती जा रही थी। सड़क पर भी पानी भर गया था। मैं सोच रहा था घर पर माँ चिंता कर रही होंगी। उन्हें कैसे खबर दूँ। तब आजकल की तरह हरेक के हाथ में मोबाइल तो होते नहीं थे। तभी एक आदमी मेरे पास आया। उसने मुझसे कहा, ‘बच्चे, यह बारिश जल्दी नहीं रुकेगी और तुम पहले ही काफी भीग चुके हो।’ यह कहते हुए उसने एक छाता मेरे हाथ में थमा दिया। बोला, ‘जाओ, अब आराम से घर चले जाओ।’ लेकिन मैं कुछ कह न सका क्योंकि मेरे हाथ में छाता थमाकर वह आदमी बारिश में कहाँ चला गया कुछ पता न चला। मैं काफी देर तक वहाँ खड़ा इधर-उधर देखता रहा कि वह अजनबी मिल जाए तो उसका छाता उसे वापस कर दूँ। पर वह मुझे कहीं नजर नहीं आया। और उस दिन क्या, बाद में भी वह आदमी मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। तब से मैं इस छाते को सदा अपने पास रखता हूँ। यह मुझे एक ऐसे आदमी की याद दिलाता है जो न जाने क्यों मुझे अपना छाता देकर खुद भीगता हुआ चला गया था।” निशीथ और उसके मम्मी-पापा समझ गए कि छाता चाहे एकदम ही टूट क्यों न जाए, बाबा इसे कभी अपने से दूर नहीं करेंगे। निशीथ ने कहा, “बाबा, आप इस छाते को सँभालकर रखिए, पर प्लीज इसे बारिश में लेकर मत निकलिए, पता नहीं देखने वाले क्या सोचेंगे।” तभी निशीथ के पापा ने एक नया छाता उन्हें थमा दिया। बोले, “बारिश या धूप में आप नया छाता लेकर जाया करें।” निशीथ के बाबा देर तक नए छाते को देखते रहे। कुछ बोले नहीं। उस दिन बाबा धूप में निकले तो निशीथ ने कहा, “बाबा, आप आज नया छाता लेकर जाइए।” 2 बाबा ने नए छाते के साथ पुराना छाता भी हाथ में उठा लिया। “बाबा, दो छाते किसलिए?” निशीथ ने पूछा। “ताकि बारिश और धूप दोनों से बचाव हो सके।” बाबा हँसकर बोले और बाहर चले गए। उन्होंने धूप से बचने के लिए नया छाता लगा लिया, पुराना छाता दूसरे हाथ में था। चलते-चलते सोच रहे थे, ‘नया छाता सिर पर है तो पुराना किसलिए? समय बदलता हे तो पुराने की जगह नया आ जाता है- लेकिन क्या पुराने को छोड़ना इतना आसान होता है?’ वह सड़क पर चले जा रहे थे तो बच्चे की आवाज कानों में पड़ी। रुककर इधर-उधर देखने लगे। सोच रहे थे, ‘इतनी कड़ी धूप में बच्चा कहाँ से आया।’ आवाज एकदम पास सुनाई दी थी। बाबा ने देखा एक औरत फुटपाथ पर बैठी कपड़े प्रेस कर रही थी। उसका मुँह पसीने से भीगा हुआ था, पास ही एक झाड़ी की ओट में जमीन पर बिछपे कपड़े पर एक नन्हा-मुन्ना लेटा हाथ-पैर चला रहा था। औरत प्रेस करते-करते झाड़ी की ओट में लेटे बच्चे को बार-बार देख लेती थी। झाड़ी की पत्तियों से छनकर धूप की बिंदियाँ नन्हे बच्चे के बदन पर गिर रही थीं, वह गरमी से बेचैन था। बाबा कुछ पल खड़े-खड़े देखते रहे फिर अपना पुराना छाता खोलकर बच्चे के ऊपर लगा दिया। छाते के फटे हिस्सों से धूप बच्चे पर गिर तो रही थी पर पहले से बहुत कम। बाबा छाता लगाकर सीधे खड़े हो गए। उन्होंने प्रेस करती हुई औरत की ओर देखा। वह हौले-से मुस्कराई जैसे उन्हें धन्यवाद दे रही हो। बाबा थोड़ा आगे बढ़ गए। मन में एक बहुत पुरानी तस्वीर कौंध गई। तेज बारिश में एक आदमी उन्हें छाता देकर न जाने कहाँ चला गया था। उनकी नजर फिर छाते के नीचे लेटे, हाथ-पैर चलाते बच्चे पर टिक गई। धूप के टुकड़े छाते के छेदों से होकर बच्चे पर गिर रहे थे। बाबा फिर से बच्चे के पास जा पहुँचे। पुराना छाता हटाकर उसकी जगह नया छाता लगा दिया। अब बच्चे का पूरा शरीर छतरी की छाया में आया गया था। धूप बिलकुल नहीं पड़ रही थी उसके ऊपर। उन्होंने हौले-से बच्चे के गाल थपथपाए और आगे बढ़ चले। उन्होंने पुराना छाता खोल कर कर लगा लिया था। पीछे से प्रेस करने वाली औरत पुकार रही थी, “बाबूजी, बाबूजी आपका छाता... बाबूजी...” लेकिन बाबा रुके नहीं, बढ़ते चले गए। सबसे पहले निशीथ ने बाबा को देखा जो पुराना छाता लगाए चले आ रहे थे। वह बोला, “बाबा, नए छाते का क्या हुआ जो यह पुराना छाता लगा रखा है?” उस दिन झूठ बोलने में बाबा को जरा भी दिक्कत नहीं हुई। बोले, “अरे भाई, एक जगह पानी पीने के लिए रुका था। वहीं छाता एक तरफ टिका दिया था। बस फिर उठाना भूल गया। यह ध्यान देर में आया कि मैंने पुराना छाता सिर पर लगा रखा है। मैं लौटकर उस जगह गया भी, पर भला नए छाते को कौन छोड़ता है।” झूठ बोलते हुए बाबा मुस्करा रहे थे। आँखों में नए छाते की छाया में आराम से लेटे नन्हे बच्चे की छवि उभर रही थी।(समाप्त)

Sunday, July 15, 2018

मिठाई--देवेन्द्रकुमार--बाल कहानी


मिठाई

                            --देवेन्द्र कुमार

 

मिठाई किसके लिए थी, यह कोई नहीं जानता था. और अब मिठाई का डिब्बा गायब था.लेकिन मिठाई जहाँ बांटी जा रही थी वहां कैसे और क्यों जा पहुंची थी!

 

पूरे घर में जाग गए थे सब लोग. अमित को सुबह की गाड़ी से आगरा जाना था दफ्तर के काम से. जाने से पहले वह पिता के पास विदा लेने गया. उन्होंने अमित के हाथ में एक छोटा सा कागज़ थमा दिया. अमित ने बिना पढ़े जेब में रख लिया. वह सोच रहा था कहीं गाड़ी छूट न जाये.

तभी बेटे अमर ने कहा – “ पापा, आगरा जा रहे हो तो ताजमहल जरुर देखना.’  अमित बेटे का मतलब समझ गया, जैसे वह कह रहा था- पापा अकेले ताजमहल मत देख लेना.

अमर का कन्धा थपथपाते हुए उसने कहा – ‘बेटा मैं तुम्हारा मतलब समझ रहा हूँ. आज तो मैं केवल एक दिन के लिए जा रहा हूँ. उसमें ताज देखने का मौका नहीं मिलेगा. और वैसे भी ताजमहल मैं तुम सबके साथ ही देखूंगा- यह वादा रहा.” कहकर उसने पत्नी और पिता की ओर देखा.

तभी पिता ने कहा-‘ मैंने जो कागज तुम्हें दिया है उस पर मेरे बचपन के दोस्त शम्भू का पता  लिखा  है. मैं बहुत समय से उनसे नहीं मिला हूँ.  इधर खबर मिली है कि वह बीमार चल रहे हैं. अगर तुम समय निकाल कर उन्हें देखने जा सको तो अच्छा रहेगा.’  

‘ मैं पूरी कोशिश करूंगा .’ अमित ने कहा और बेटे अमर के गाल थपथपा कर घर से बाहर निकल गया. मन में बेटे की बात घूम रही थी. आगरा पहुँच कर अमित ने होटल में जाकर सामान रखा, फिर कुछ नाश्ता करके दफ्तर के काम से निकल पड़ा. दफ्तर के काम से फुर्सत पाते- पाते दोपहर बीत चुकी थी.  अब उसे पिता से मिले परचे का ध्यान आया. परचे पर एक पता लिखा था- e  502 आम्रपाली अपार्टमेंट्स . वह एक रिक्शा में बैठ कर चल दिया. फिर ध्यान आया कि किसी के घर

                                   1

पहली बार ख़ाली हाथ जाना ठीक नहीं रहेगा. हलवाई की दुकान के सामने रूककर उसने मिठाई ली और फिर आगे चल दिया.

आम्रपाली अपार्टमेंट्स एक बहुमंजिली इमारत थी. वह लिफ्ट से पांचवीं मंजिल पर पहुँच गया. जब वह फ्लैट नं 502 की ओर बढ़ा तो ठिठक गया. फ्लैट के दरवाज़े के आगे तथा गैलरी में काफी लोग जमा थे. हवा में बातों की भनभनाहट गूँज रही थी.

अमित के कदम अपनी जगह ठिठक गए. कुछ पल असमंजस में खड़ा रहा, फिर पास वाले आदमी से पूछा तो पता चला कि पिताजी के मित्र शम्भूजी की मौत हो गई है. वह काफी समय से बीमार चल रहे थे. अमित को धक्का लगा. वह पिता के बारे में सोचने लगा. मित्र की मौत की खबर से उन्हें काफी दुःख होगा. उसकी नज़र हाथ के मिठाई के डिब्बे पर गई. वह मन ही मन सकुचा गया. समझ नहीं पाया कि मिठाई का क्या करे.! उसकी आँखें बचने का रास्ता खोजने लगीं. तभी दिखाई दिया दरवाज़े के बाहर एक छोटी सी अलमारी रखी थी. अमित ने मिठाई का डिब्बा अलमारी के ऊपर टिका दिया, फिर जूते उतार कर अंदर चला गया. किसी ने उसकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. अमित ने अंदर एक लड़के को देखा , शायद वही शम्भूजी का बेटा था. कुछ देर उससे बात करके वह बाहर निकल आया. न चाहते हुए भी उसकी नज़रें अलमारी की ओर चली गईं .मिठाई का डिब्बा अपनी जगह नहीं था. वह हैरान था कि ऐसे समय में कौन था जो मिठाई उठा ले गया! पर उसने ज्यादा नहीं सोचा ,और आगे चला आया. वैसे भी मिठाई अब उसके लिए बेकार थी ,पर फिर भी बात दिमाग से नहीं निकल रही थी.

अमित लिफ्ट के आगे जा खड़ा हुआ. तभी उसने एक पुकार सुनी. मुड़कर देखा तो एक आदमी उसे इशारा कर रहा था. फिर वह पास चला आया. उसने कहा -’ आप शायद मिठाई का डिब्बा खोज  रहे हैं जिसे आपने अलमारी पर रखा था. मैंने आपको डिब्बा रखते हुए देखा था.’ अमित चुप खड़ा रहा, वह कहता भी क्या. फिर उसने पूरी बात बता दी. उस आदमी ने कहा-‘ मेरा नाम  रामसरन है. मैं शम्भूजी का रिश्तेदार हूँ. मैने एक लड़के को डिब्बा ले जाते हुए देखा था.

                                   2

अमित ने कुछ नहीं कहा. वह जल्दी से जल्दी वहां से दूर चला जाना चाहता था. वह लिफ्ट से नीचे आया तो रामसरन भी उसके साथ था. वह कह रहा था –‘ वह लड़का फूलवाले का नौकर है . वह फूल देने आया था. मैं फूल वाले को अच्छी तरह जानता हूँ. ‘ अमित ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह सोच रहा था कि पिता को उनके मित्र के निधन की सूचना कैसे देगा. वह आगे बढ़ा तो पीछे से रामसरन की आवाज़ आई-‘ अरे वाह ! फूलवाला तो यहीं खड़ा है. चलो उसी से पूछते हैं.’ ‘अमित ने मुड़ कर देखा तो रामसरन किसी से बात कर रहा था. उसने अमित को इशारे से बुलाया तो अमित वहां चला गया.

उसने सुना -फूलवाला कह रहा था-‘यह तो बहुत गलत किया मेरे नौकर श्याम ने. मैं उस चोर को अभी नौकरी से निकाल दूंगा .’ फिर अमित से माफ़ी मांगता हुआ बोला-‘ वह काफी देर से गायब है. इसीलिए मुझे यहाँ आना पड़ा, उसका घर पास ही है. आइए बाबूजी, उसके घर चल कर खबर लेता हूँ.’

अमित ने कहा-‘ मुझे अभी दिल्ली लौटना है. मैं नहीं चल सकता. ‘ लेकिन फूलवाला बोला- ‘बाबूजी, बस पांच मिनट की ही तो बात है. आखिर वह आपका चोर है.’ रामसरन ने भी कहा तो अमित को मानना पड़ा . थोड़ी दूर जाकर फूलवाला एक दरवाजे के सामने रुक गया. उसने जोर से पुकारा-‘ओ श्याम, जरा बाहर तो निकल, देख मैं तेरा क्या हाल करता हूँ.’

दरवाज़ा खुला और एक आदमी बाहर निकला. उसने फूलवाले से कहा-‘ बाकी बातें बाद में ,लो पहले मुंह मीठा करो. आज हमारे घर लक्ष्मी पधारी है, श्याम के जन्म के इतने बरसों बाद बेटी

 हुई है.’ यह कहकर उसने मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ा दिया. अमित चौंक उठा,  यह तो मिठाई का   वही डिब्बा था जो फ्लैट के बाहर रखी अलमारी के ऊपर से गायब हो गया था. उसे गुस्सा आ गया. फूलवाले ने मिठाई का डिब्बा परे ठेलते हुए कहा-‘ हम चोरी की मिठाई नहीं खाते. जरा श्याम को तो बुलाओ, उसने चोरी की है.’ फिर उसने अमित की ओर इशारा करके सारी घटना कह सुनाई.

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श्याम का पिता जैसे सन्न खड़ा रह गया. फिर उसने तुरंत पुकारा –‘ ओ श्याम के बच्चे! जरा बाहर तो निकल. तू घर में चोरी कि मिठाई कैसे लाया ! .आज तूने मेरी ख़ुशी ख़ाक में मिला दी. ‘ श्याम झट बाहर निकल आया. उसका सर झुका हुआ था. श्याम के पिता की आँखों में आंसू थे. उसने कहा-‘ बाबू , सच मुझे एकदम पता नहीं था कि यह चोरी की मिठाई है. आज मैं कितना खुश था कि घर में  लक्ष्मी आई है.मैने तो अपने मेह्मानों का मुंह बताशों से मीठा करवाया था. हम भला इतनी महंगी मिठाई कहाँ से ला सकते थे.’

फूलवाले ने श्याम से पूछा तो उसने जो बताया वह इतना ही था कि जब वह फूल देकर निकला  तो उसे मिठाई का डिब्बा नज़र आया था, उसने सोचा कि गम के माहौल में मिठाई भला कौन खायेगा.  .उसे लगा घर में बहन पैदा हुई है ,वह सबका मुंह मीठा करवा देगा. वह चोर नहीं है.उसने दूकान पर कभी चोरी नहीं की.

अमित ने देखा श्याम रो रहा था.उसका पिता किसी प्रतिमा की तरह खड़ा था. मिठाई का डिब्बा उसने जमीन पर टिका दिया था. कुछ पल सन्नाटा रहा.फिर अमित ने डिब्बा उठा कर फूलवाले की तरफ बढ़ा दिया-‘ फूलवाले भाई, तुम ने सुना नहीं आज श्याम की बहन ने जन्म लिया है. यह तो ख़ुशी का मौका है. गुस्सा थूक दो. ‘ और उसने मिठाई की एक डली उसके हाथ पर रख दी,फिर बारी बारी से डिब्बा सबके बीच घुमा दिया.अमित ने श्याम और उसके पिता से भी मिठाई खाने को कहा. उदासी की जगह मुस्कान ने ले ली. अमित ने श्याम के पिता से पूछा -‘तुमने बेटी का नाम क्या रखा है. ‘

‘जी अभी तो कुछ सोचा नहीं.’ लड़की तो लक्ष्मी होती है.’ वह बोला.

‘उसका नाम लक्ष्मी ही रखना.’ फिर अमित ने फूलवाले की ओर देख कर पूछा -‘ क्या कहते हो?’

‘जी बढ़िया रहेगा.’ फूलवाला हंस रहा था.

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अमित ने उससे कहा-‘ श्याम ने चोरी नहीं की है.इसे नौकरी से मत निकालना.’

फूलवाले का गुस्सा दूर हो गया था.उसने श्याम से कहा-‘चल, दुकान पर चल. अगर तू मुझे सुबह बता देता तो मैं खुद मिठाई लेकर तेरे घर आ जाता.’

अमित का मन शम्भूजी की मौत से उदास हो गया था ,पर अब उदासी में मिठास घुल गई थी. =====                                                             (समाप्त )

                                       

Wednesday, June 13, 2018

भरने का खेल--देवेन्द्र कुअर--पर्यावरण कथा


भरने का खेल===देवेन्द्र कुमार ==पर्यावरण कथा
कैसा था यह खेल जिसे क्या बच्चे क्या बड़े –सभी खेलना चाहते थे!  
 

 

      चुन्नू के पास आजकल कोई काम नहीं है। कई महीनों से बेरोजगार चल रहा है। बहुत कोशिश की है। जिसने जहां बताया वहीं गया है, पर अब तक कुछ न हुआ। बीच में कई दिन रिक्शा चलाई, पर बीमार होने के कारण वह काम भी छूट गया।

      उस दिन बाजार में गुलाब सिंह मिल गए। दोनों एक ही गांव के हैं। गुलाबसिंह की दुकान अच्छी चलती है। चुन्नूसिंह ने उन्हें अपना हाल बताया तो गुलाब सिंह ने कहा-तुम कल सुबह मेरे घर आ जाना। शायद मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकूं।उन्होंने सुबह ठीक दस बजे बुलाया था। लेकिन चुन्नू तो आधा घंटा पहले ही पहुंच गया। उसे डर था कहीं देर न हो जाए। पर गुलाबसिंह घर पर न थे। वह कुछ देर दरवाजे पर खड़ा रहा फिर घर के सामने वाले पार्क में चला गया।

        सर्दियों के दिन थे। अभी धूप अच्छी तरह निकली नहीं थी-कहीं कहीं नजर आ रही थी। बाग में सन्नाटा था। चुन्नू घास पर जा बैठा। घास अभी ओस से गीली थी। कपड़े नम हो गए तो उठकर टहलने लगा। ठीक दस बजे फिर गुलाबसिंह के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। पता चला वह जरूरी काम से कहीं दूर चले गये हैं, देर से लौटेंगे।

         चुन्नू की समझ में न आया कि अब क्या करे। आखिर वह कब तक प्रतीक्षा कर सकता था। थोड़़ी देर और रुकने की सोचकर फिर से बाग में चला आया। अब धूप और फैल गई थी। कई बच्चे आकर घास पर दौड़भाग करने लगे थे। बच्चों का यों फुदकना, हंसना चुन्नू को अच्छा लगा। तुरन्त गांव में मौजूद अपने बच्चे की याद आ गई। वह भी तो घास पर उछलते खिलखिलाते इन्हीं बच्चों जैसा है, पता नहीं कैसा होगा। चुन्नू का मन हुआ कि दौड़कर जाए और अपने बेटे को गोद में भर ले। पर यह नहीं हो सकता था। जब तक शहर में कोई ठीक काम न मिल जाए वह परिवार को यहां नहीं ला सकता था।

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         चुन्नू का मन उदास हो गया, पर फिर भी नजरें घास पर दौड़ते भागते बच्चों पर टिकी रहीं। एकाएक उसने एक बच्चे को जमीन पर गिरते देखा। शायद बच्चे का पैर मुड़ गया था। वह पैर को पकड़कर चीख रहा था। चुन्नू तुरन्त दौड़कर बच्चे के पास जा पहुंचा। उसे गोद में उठाया और पैर मलने                                               

 लगा। तभी बिट्टू-बिट्टू पुकारती हुए एक औरत बाग में दौड़ी आई। शायद वही उस बच्चे की मां थी। औरत ने बच्चे को चुन्नू के हाथों से झपट लिया। पूछा--तुमने इसे मारा क्या?”

       चुन्नू झट बोला-जी नहीं, एकदम नहीं। मैं तो दूर बैठा था। इसे गिरते देखा तो दौड़कर उठाया। शायद पैर में चोट लगी है। डाक्टर को दिखाना होगा।

       हूं....बिट्टू की मां ने कहा-आज इसके पापा भी घर पर नहीं हैं। सुबह ही कहीं चले गए। मैं इसे रोकती रही पर यह बाग में भाग आया और अब देखो...

                     चुन्नू ने कहा-कोई बात नहीं, मैं बच्चे को डाक्टर के पास ले चलता हूं।फिर उसने बताया कि वह किसका इंतजार कर रहा था। गुलाबसिंह का नाम सुनकर लगा जैसे औरत को कुछ तसल्ली हो गई। बोली-हां, वह कहीं गए हैं। हम लोग उन्हीं के मकान की ऊपर वाली मंजिल में रहते हैं।

      चुन्नू ने बच्चे को फिर से गोद में ले लिया और उसकी माँ के पीछे-पीछे चल पड़ा। डाक्टर का दवाखाना पास में ही था। चुन्नू संकोच में था क्योंकि उसकी जेब में बहुत थोड़े से पैसे थे।

       डाक्टर ने बिट्टू के पैर की जांच की फिर बोला-इसका पैर किस गड्ढे में पड़कर मुड़ गया है पर चोट ज्यादा नहीं है।फिर डाक्टर ने पैर की पट्टी कर दी।

        बिट्टू की मां ने कहा-भला बाग में गड्ढे का क्या काम।फिर डाक्टर को फीस देकर अपने बच्चे को घर में ले गई। जब वह घर में जा रही थी तभी गुलाबसिंह उधर आते दिखाई दिए। उन्होंने चुन्नू को अंदर बुला लिया। बोले-माफ करना भाई, मुझे आने में देर हो गई।तब तक बिट्टू की मां ने उन्हें बच्चे को चोट लगने की बात बता दी। और चुन्नू की ओर इशारा करते हुए कहा-इन्होंने ही बच्चे को दौड़कर उठाया था।

        गुलाबसिंह ने चुन्नू को अपनी दुकान पर काम करने को कहा। बोले-मैं तुम्हें ज्यादा पैसे तो नहीं दे सकूंगा, पर कुछ समय तक तो तुम्हारा काम चल ही जाएगा। मेरी दुकान पर काम करते हुए तुम दूसरा काम भी खोज सकते हो।उन्होंने चुन्नू को अगले दिन आने के लिए कह दिया।

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        काम का इंतजाम हो जाने से चुन्नू की चिंता कुछ काम हो गई। वह फिर बाग में चला आया। उसके कानों में डाक्टर की बात गूंज रही थी- ‘बच्चे का पैर किसी गड्ढे में पड़कर मुड़ गया है।‘ वह बाग में घूमता हुआ सोच रहा था-बाग में अगर गड्ढा है तो कहां? यह तो बहुत खतरनाक बात है। आज एक बच्चे का पैर गड्ढे में फंसकर मुड़ा है तो कल कोई और बच्चा इसी तरह घायल हो सकता है। यह                                         सोचता हुआ चुन्नू ध्यान से बाग में उगी घास के अंदर देखता हुआ चलने लगा। और उसने देखा घास में एक नहीं कई छोटे-छोटे गड्ढे नजर आ रहे थे। उन गड्ढों का कारण समझने में देर नहीं लगी।

       अक्सर बाग या मैदानों में शादी ब्याह या दूसरे समारोह होते हैं तो शामियाने खड़े किये जाते हैं। शामियाने के डंडे जब उखाड़े जाते हैं तो गड्ढे रह जाते हैं। शामियाने लगाने वालों को बांस गाड़ना तो याद रहता है पर बांसों के कारण होने वाले गड्ढों को भरने की बात वे एकदम भूल जाते हैं। यह सोचते-सोचते चुन्नू ने तय किया कि वह बाग की जमीन में बने ज्यादा से ज्यादा गड्ढे भरने की कोशिश  करेगा।

      बाग के बाहर एक तरफ रेती और बदरपुर का ढेर लगा हुआ था। चुन्नू ने जमीन पर पड़ा एक गत्ते का टुकड़ा उठाया। उस पर रेत और बदरपुर रख लिया और बाग में जाकर बारी बारी से गड्ढे भरने में जुट गया। तब तक धूप अच्छी तरह फैल चुकी थी। बाग में कई लोग धूप सेकने आ बैठे थे। काफी बच्चे भी इधर से उधर धमा चौकड़ी मचा रहे थे। चुन्नू का मन घबरा गया। उसे लगा कहीं किसी बच्चे का पैर गड्ढे में न चला जाए.  उसने जोर से पुकार कर कहा—‘बच्चो, घास पर मत दौड़ो, रुक जाओ। घास में गड्ढे हैं। तुम्हारा पैर गड्ढे में फंस सकता है।

              चुन्नू को यों जोर से पुकारते देख लोग उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे तो चुन्नू ने अपनी बात दोहरा दी, फिर रेत और बदरपुर से घास में छिपे गड्ढे भरने में जुट गया। उसकी देखा देखी और भी कई लोग इस काम में लग गए। बच्चों ने इसे नया खेल समझा और वे भी इस खेल में शामिल हो गए। बच्चे दौड-दौड़कर कागजों में रेत और बदरपुर लाकर लोगों को देने और कहने लगे-अंकल, गड्ढे भर दो नहीं तो हमें चोट लग जाएगी।

       चुन्नू की देखा-देखी बहुत सारे स्त्री-पुरुष और बच्चे गड्ढे भरने के खेल में लग गये। अब पता चला कि बाग की जमीन में एक नहीं अनेक छोटे-छोटे गड्ढे और सूराख थे और यह बच्चों के कोमल, छोटे पैरों के लिए बहुत ही खतरनाक था।

      आखिर बाग की धरती में बने सारे गड्ढे भर दिए गए। मोहल्ले वालों ने फैसला किया कि आगे से वे किसी टैंट वाले को बाग में टैंट नहीं लगाने देंगे।

                                     3   

     सबसे ज्यादा खुशी चुन्नू को थी। सब उसकी तारीफ कर रहे थे। खास तौर से बच्चे तो उसके पक्के फैन हो गए थे। उस दिन उसे मोहल्ले में बहुत देर तक रुकना पड़ा। बिट्टू की मां ने उसे अपने घर चाय पीने के लिए बुलाया तो मोहल्ले के बच्चे भी आए। जब वह चलने लगा तो बच्चों ने कहा-अंकल,                                          यह गड्ढे भरने का खेल आपके साथ हम भी खेलना चाहते हैं। बताइए, अगली बार यह खेल कहां खेला जाएगा?”

    चुन्नू क्या कहता, बस मुस्कराता रहा-मन ही मन उसने निश्चय कर लिया था-अगर किसी बाग में, फुटपाथ पर कहीं कोई गड्ढा देखेगा तो उसे भरने की कोशिश जरूर करेगा ताकि किसी छोटे बड़े का पैर उसमें फंसकर घायल न हो जाए।  ( समाप्त )

 

Tuesday, June 12, 2018

जादू हो--देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


जादू हो—देवेन्द्र कुमार-–बाल गीत

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जादू हो भई जादू हो
 

मुरझाए जो फूल पड़े हैं

उनमें फिर से खुशबू आए

सूखा कुआं गली का अपना

मीठे पानी से भर जाए
 

टूट गिरे जो पत्ते भैया

फिर से पेड़ों पर लग जाएं

पंखहीन जितनी भी चिडि़यां

उड़कर आसमान में जाएं
 

टूटे घर फिर से बन जाएं

सूखी फसलें फिर लहराएं

आसमान से रोटी बरसे

भूखे सभी पेट भर खाएं
 

जादू हो भई जादू हो

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