Monday, April 23, 2018

पुस्तकें बदल गईं --देवेन्द्र कुमार --कविता


पुस्तकें बदल गईं—देवेन्द्र कुमार—कविता
                                         

मैं

कहीं और था

यहाँ पुस्तकें बदल गईं
 

बाहर ही रोककर

पूछा गया

यह नहीं

कि क्या था मेरे पास

बताऊं

मैं हूं किसके साथ?

क्या कहता

हिला दिए

खाली हाथ
 

मैं था जंगल में

डरी हुई चिडि़या से बातों में

और

यहां वे लगे थे

धरती-आकाश मिलाने में

सच

बहुत कुछ बन गया था

पूरी बस्ती

खर्च हो गई थी

महज

एक दीवार उठाने में
 

मैं उडा था

हवा में

टूटे पत्ते सा

फूलों पर टलमल

मोतियों में

इंद्रधनुष देखता

वहां

हंसी का अर्थ

खिलना

यहां

खिलखिल अमरबेल

चढ़ी है

गैर आंसुओं की मुंडेरी
 

सचमुच

पुस्तकें बदल गईं।

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