एलबम—देवेन्द्र कुमार—कविता
मां
हर पल
लड़खड़
तलुवे आधे
बेदम साधे
लोरी गुमसुम
बहती करुणा
बेचेहरा मां!
बप्पा
गुस्सा
मूंछे
फड़कन धड़कन
कंधे कांपें
हर पल हांफें
बेबस
बप्पा!
बड़का भैया
कागज में गुम
हर सुर बेधुन
एड़ी घायल
आए जाए
जाए आए
सिर पर लटके
हम सबका कल
बड़का भैया!
छोटी बहना
छूते टूटें
गोरे
गीले
कच्चे रंग के
अनगढ़ सपने
ताके झांकें
खाएं आंखें
अपनी
बहना!
======
No comments:
Post a Comment